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यथार्थ

 #यथार्थ ये कंकड़ पत्थर पथ के हमको  रोक कहां तक सकते हैं कोई इनको बतला दे हम असंख्य पैरों में छाले रखते हैं। गर करनी हो पूजा तो  फिर तुम मानवता को पूजो उनकी पूजा व्यर्थ है जो दिल में विष के प्याले रखते हैं। प्रेम अगर करना हो तो तुम मातृभूमि से प्रेम करो उनका प्रेम निरर्थक है जो प्रेयसी को गलबांहें डाले रखते हैं। तुम अधुनातन की चाह में  पाश्चात्य का पोषण करते हो हम भारत की अभिजात संस्कृति  हृदय में संभाले रखते हैं। बहुमूल्य रत्न हो उन्हें मुबारक जो इन की चाहत रखते हैं मेहनतकश तो घर में बस दो वक्त के निवाले रखते हैं। निर्धन के घर के दरवाजे  सदैव ही खुले रहते हैं लूटने का तो खौफ उन्हें है जो घर के अंदर भी ताले रखते हैं। तुम द्वेष घृणा अपशब्दों से नफरत का अंधेरा फैलाओ हम स्नेह प्रेम की बातें कर  हर वक्त उजाले रखते हैं। ....✍️ आपका मित्र          उमाशंकर मिश्रा